डरावने पल

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घर की याद

अपने कॉलेज के दिनों घर से दूर दूसरे शहर इलाहाबाद में रहता था। एक समय की बात है शनिवार के दिन मैं शाम को 8 बजे प्रयाग स्टेशन से बुंदेलखंड एक्स्प्रेस ट्रेन पकड़ता हूँ। यह ट्रेन इलाहाबाद में इंजन बदलती है और अपने रास्ते में दुबारा रात के लगभग 9:30 PM पर चल देती है।

अजीब है ये तो

उस समय सर्दी का समय था। ज्यादातर यात्री इलाहाबाद जंक्शन में ही उतर गए थे। मेरे कोच में उस समय 5 यात्री और सिर्फ मैं मौजूद था। उनमे से एक यात्री बिल्कुल कोने में सबसे अलग बैठा था जो की बड़ी देर से मुझे घूरे जा रहा था। उस समय थोड़ा डर लग रहा था पर सब के होने की वजह से डर महसूस नही हो रहा था। धीऱे धीरे गाड़ी आगे बढ़ने लगी और स्टेशन आते गए और यात्री उतरते गए। जैसे जैसे यात्री उतरते जा रहे थे मेरी दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी। तभी हम शंकरगढ़ स्टेशन पहुँच गए जहाँ पर दो यात्री और उतर गए। अब उस डब्बे में सिर्फ तीन लोग बचे थे। एक तो मैं दूसरा वो घूरने वाला आदमी और तीसरा एक यात्री। अब ट्रेन चली और अगला स्टेशन था बरगध, वो आदमी अब भी मुझे घूरे जा रहा था। मुझे उस समय डर लग रहा था। वह गेट के बगल वाली सीट पर बैठा था। मैं उससे नजरे बचाने के लिए खिड़की के बाहर देखने लगा और मन ही मन डर कर सोच रहा था कि ये ऐसे मुझे क्यों देख रहा है। ऐसे ही सोचते सोचते बरगध स्टेशन आ गया और एक और यात्री उतर गया।

डर गहरा गया


अब मुझे और डर लगने लगा। तभी मैंने गेट के पास जाकर कुछ देर बाहर देखने की सोची। पर जैसे ही मैं उठने वाला था कि वह आदमी उठा और गेट के पास जाकर खड़ा हो गया और मुझे घूरने लगा। इतने में ट्रेन चल पड़ी। बाहर बिल्कुल घना कोहरा था। दूर दूर तक ना ही कोई आदमी था और ना ही कोई गावहा…..सिर्फ जंगल ही जंगल था। मैं उसके बारे में सोच ही रहा था कि देखा वह आदमी धीमे धीमे मेरे तरफ ही आ रहा है। मैं फट से डर के मारे उठा और अपना समान लेकर आगे के डब्बे में जाने लगा। तभी अचानक किसी ने चैन पुलिंग कर दी और ट्रेन रुक गयी। बाहर बिल्कुल अंधेरा था और अंदर डर। मैं तेजी से आगे के डब्बे में जाता जा रहा था और वो आदमी मेरा पीछा कर रहा था। कुछ देर चलने के बाद मैंने ध्यान दिया की मैं वापस उन्ही डब्बों में वापस आ गया जहाँ से मैं कई बार गुजरा हूँ। मैं ये सब सोच ही रहा था की अचानक मेरी नजर सामने लगे हुए शीशे पर पड़ी। मैंने शीशे में देखा की वह आदमी दरवाजे पर टिके खड़ा हुआ मुझे ही देख रहा है। तभी ट्रेन ने हॉर्न मारा और खट की आवाज आते ही ट्रेन चल पड़ी। मैं चुप-चाप एक सीट पर बैठ गया और अगला स्टेशन आने का वेट करने लगा। तभी ट्रेन ने तेज रफ़्तार पकड़ी।

अब क्या होगा?

थोड़ी देर बाद वह आदमी सामने वाले शीशे को तोड़ देता है। फिर मुझे थोड़ी देर घूरता है और एक काँच का टुकडा उठाकर मेरी और आता है। मुझे डर लग रहा था। फिर वह मुझ पर उसी काँच के टुकड़े से हमला करता है। मैंने जैसे तैसे करके उस हमले को रोक लिया। पर हाथपाई करते करते हम गेट तक पहुँच गए। तभी उसने मुझे बाहर की और धक्का दे दिया। मैंने ट्रेन का दरवाजा पकड़ लिया और अंदर जाने की कोशिश करने लगा पर उसने मेरे छाती मे जोर से मारा और मैं चलती ट्रेन से नीचे गिर कर बहोंश हो गया। जब मुझे होंश आया तो पता लगा मैं बिस्तर से गिर गया हूँ और सब मुझे देखकर हँस रहे थे। थोड़ी देर सोंचने के बाद पता चला मैं ये सब सपना देख रहा था।……

Story By – Adarsh Kumar

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