1 बावला भगत | घर आई भूतों की बारात। सबसे डरावनी भूत की कहानी

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आधी रात होते ही वो ‘भूतों की बारात’ दूर से मामा को दिखने लगी मामा भी तैयार थे और उन्होंने अपने ‘देवों’ को चौकन्ना कर दिया और कहा कि जैसे ही मैं इशारा करूँ तुम उस ‘दूल्हे’ को बांधकर उठा लेना और मेरे पीछे घर ले आना! इतने में ‘भूतों की बारात’ नाचते-कूदते पास में आ गई, मामा ने तुरन्त ही अपने 5 देवों को आदेश दिया कि “दूल्हे को उठा लो”

फिर क्या हुआ “बावला भगत” पूरी कहानी पढ़कर जाने…

बावला भगत का परिचय

कोई किसी से छेड-छाड़ करे तो ये अच्छी बात नहीं होती! इस छेड-छाड़ को ‘असामाजिक’ और ‘गैर कानूनी’ माना जाता है और अगर यह छेड-छाड़ ‘भूतों’ से हो तो ये फिर ‘जानलेवा’ साबित हो सकती है!

men explaining their storyमेरा नाम सोहन है, मेरी उम्र 29 साल है और मैं ‘नोएडा’ ‘उत्तर प्रदेश’ का रहने वाला हूँ, इस कहानी में जिन घटनाओं का वर्णन है वो घटनाएं मेरे मामाजी के साथ 2010 में घटित हुई थी और मैं भी अपने कई ‘रिश्तेदारों’ सहित उन घटनाओं का ‘गवाह’ हूँ!

मेरे मामाजी जिनका नाम ‘कुंदन’ था और उनकी उम्र 2010 में 32 साल थी, उनकी शादी हो चुकी थी और उनका एक 3 साल का बेटा भी था, मेरे मामा अलीगढ उतर प्रदेश में रहते थे, कुंदन मामा ‘बेरोजगार’ थे मगर कभी जब उनका ‘मन’ करता तो वो नानाजी का ‘खेती’ में हाथ बटा दिया करते थे, कुंदन मामा का भूत, प्रेत, चुड़ैल और ऐसी ‘काली शक्तियों’ से काफी ‘आकर्षण’ था और इसलिए वो ऊपरी शक्तियों का इलाज करने के लिए ‘भगत’ बने थे, उनको भगत बने 6 महीने भी नहीं हुए थे और उन्होंने ‘मुसीबत’ मोल लेनी शुरू कर दी थी, 

बावला भगत की पहली करतूत

‘बावला भगत’ ने की अपनी पहली करतूत! कुंदन मामा अपनी शादी से पहले एक लड़की से ‘प्यार’ करते थे मगर एक ही गाँव का होने की वजह से दोनों की शादी नहीं हो सकती थी इसलिए उस लकड़ी की शादी कहीं और करा दी गई और मामा ने मामी से ‘शादी’ कर ली मगर इतने साल शादी को गुजरने के बाद भी वो उस लड़की को भुला नहीं पाए थे

फिर एक दिन उनको अचानक उस लड़की की मौत की खबर मिली जिसको सुनकर मामा को बहुत जोर का झटका लगा और वो सोचने लगे कि हम जीते जी एक ना हो सके तो क्या हुआ? अब मैं भगत बन ही चुका हूँ तो मैं उसकी आत्मा तो अपने साथ रखूँगा!

शरीर नहीं तो आत्मा (Aatma) सही

उस लड़की की शादी दूसरे गाँव में हुई थी तो उसके सारे अंतिम संस्कार ससुराल से ही होने थे, मामा दो दिनों बाद उस लड़की के कोई रिश्तेदार बनकर उस लड़की की ससुराल पहुँच गए, जब मामा लड़की की अब ससुराल में जाकर बैठे तो उन्होंने अपने ‘देव’ को लड़की की आत्मा को वहाँ से उठाने का आदेश दे दिया, वो “देव” को मजबूरी में ऐसा करना पड़ा क्यूंकि मामा उनकी ‘उपासना’ करके ही ‘भगत’ बने थे वो “देव” ने उनके सभी काम करने का ‘वचन’ भी दे रखा था और मामा उस ‘देव’ से बड़े थे इसलिय उन्होंने अभी ताजा-ताजा ‘मरी’ लड़की की ‘आत्मा’ को मामा के कहने पर उठा लिया और घर ले आए!

लेने के देने पड़े

scare lookingअब मामाजी रोज अपना कमरा बंद कर लेते और उस ‘आत्मा’ को ‘प्रसन्न’ करने के लिए उसकी पसंद की ‘मिठाई’, ‘कपडे’, ‘सिंगार’ का सारा सामान, फल, फूल और कई तरह की ‘खुशबुएं’ एक ‘हवनकुण्ड’ में ‘अग्नि’ जलाकर उसके पास ये सब चीज़ें रख देते और उसको अपनी साधना से साधने की कोशिश करते थे, जब कोई पूछता कि दरवाजा क्यों बंद किया हुआ है तो कुंदन मामा कहते कि ‘देवी और देवताओं’ की ‘साधना’ कर रहा हूँ, कोई नहीं समझ पाता था की मामा आखिर रोज करते क्या हैं?

कुंदन मामा ने अब दिन वाली पूजा रात में करनी शुरू कर दी, ‘काली शक्तियों’ की ‘साधना’ रात में काफी कारगर और प्रभावशाली होती है इसलिय इस बार ये साधना रंग लाई लेकिन इसका असर मामा पर एकदम उल्टा हो गया, मामा चाहते थे उस लड़की की ‘आत्मा’ उनके साथ रहे, उनका कहना माने और उनके सारे काम करे मगर उस आत्मा ने मामा पर ही हमला बोल दिया, 

लड़की की ‘आत्मा’ मामा के शरीर में घुस गई और अब मामा उसके अनुसार चलने लगे, मामा की ‘चाल’ लड़कियों जैसी हो गई, लड़कियों वाली ‘अदाओं’ से वो हर बात करने लगे, मामा का हंसना, रोना, खाना, उठना-बैठना सब एकदम बदल चुका था या यूँ कहें कि ‘पलट’ चुका था, मामा अकेले में मामी के ‘कपडे’ पहनकर ‘मेकअप” कर लेते और दरवाजा बंद करके घंटों बैठे रहते, घरवालों को उनपर ‘शक’ तो पहले से ही था

फिर एक दिन मामा दरवाजा बंद करना भूल गए जिससे उस दिन नानी एकदम कमरे में आ गईं और मेरी नानी ने उसको लड़कियों की तरह सजा-धजा देख लिया, पहले तो नानी ने मामा को डंडे से काफी मार लगाई फिर उन्होंने मामा के “गुरुजी” को उसी दिन घर बुला लिया! 

इन्ही “गुरूजी” ने कुंदन मामा को “भगत” बनाया था, “गुरूजी” ने उनको देखा और कुछ “भभूत” उसके माथे पर मली तो वो लड़की की आत्मा मामा के ‘सर’ आई और उस लड़की की आत्मा ने ही कुंदन मामा की ये सब ‘तिगडम’ सबको बताई कि कैसे इसने मेरी ‘आत्मा’ को ‘ससुराल’ से उठाकर ‘पूज’ लिया और ये सब उसका ही ‘नतीजा’ है, गुरूजी ने उस ‘आत्मा’ का ‘उतारा’ करके उसको उसके स्थान पर भेज दिया और कुंदन मामा को एकदम ठीक कर दिया! सबने मामा को कहा कि तू ‘भगत’ है या “बावला भगत” है और बैठाकर समझाया कि तुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था और आगे से ऐसा कभी न हो जाए!

नयी खुराफात से उपजी आफत

लेकिन “बावला भगत” कहलाने वाले कुंदन मामा के दिमाग में ‘खुराफ़ात’ चलती रहती थी और यही उनका स्वाभाव भी था, एक दिन गाँव में किसी को “भूत बाधा” हो गई तो गाँव के काफी लोग उस घर में जमा हो गए, जिस लड़के पर वो ‘साया’ था वो अपने घर के ‘आँगन’ में अपने सारे कपडे फाड़ कर खेल रहा था और उसको रोकने के लिए आस-पास के कई बड़े ‘भगतों और ओझाओं’ को उस लड़के के परिवार ने बुला रखा था!

bawla bhagatबताते हैं कि उस लड़के ने किसी दूर गाँव के मुख्य “पीर साहब” के थान की दीवार पर गलती से ‘पेशाब’ कर दिया था और उस लड़के का तब से ही बुरा हाल था, वो लड़का पूरा लहू-लुहान हो रखा था, उस लड़के का चेहरा और शरीर ऐसा लग रहा था मानो कभी भी फट जायेगा, काफी ‘मशक्कत’ के बाद कई बड़े ‘भगतों’ ने मिलकर, उन “पीर साहब” के हाथ-पैर जोड़कर उनको मनाया था और उन ‘पीर साहब’ को उस लड़के के सर से ‘उतार’ कर गाँव के बड़े चौक पर उनको रख दिया था

जिससे अब लड़का काफी ठीक महसूस कर रहा था, इस इलाज के पूरा होते हुए रात के 3 बज चुके थे तो सब अपने घर चले गए बस कुंदन मामा ने उस ‘पीर साहब’ को अपने ‘वश’ में करने की ‘ठान’ ली और अपने पास जो दो “देव” उनके गुरु ने उनको लोगों का इलाज ‘भूत-प्रेतों’ से करने के लिए दे रखे थे उन दोनों को भेजकर उन “पीर साहब” को अपने साथ लाने का आदेश दे दिया और घर चले आए! 

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कुछ देर बाद जब मामा सो गए तो वो ‘पीर साहब’ देवों की पकड़ से निकल गए और “पीर साहब” ने मामा को उनकी “खाट” पर उल्टा करके उनके दोनों हाथ कमर के पीछे बांध दिये और उनके ऊपर बैठ गए, मामा अपने पास लेटी मामी को ‘ज़ोर’ से आवाज़ देते रहे मगर उनकी आवाज की जगह एक कोयल की “कूह-कूह” की आवाज ही निकल रही थी, ना तो मामा हिल पा रहे थे और ना ही उनकी आवाज़ एक ‘कोयल’ की ‘कूक’ से ज्यादा निकल पा रही थी

ऐसा करते-करते 1 घंटे से ज्यादा का समय बीत चुका था और दिसंबर के महीने में भी मामा का पसीना बहे जा रहा था, फिर मामी को कुछ एहसास हुआ कि कमरे में इतनी देर से ये ‘पंछी’ की आवाज कहाँ से आ रही है तब जाकर उनकी ‘आँखें’ खुली और उन्होंने जैसे ही लाइट जलाई और मामा से पूछा क्या हुआ जी? ऐसे क्यों कर रहे हो?

कुंदन मामा तपाक से ‘खाट’ से कूदकर ज़मीन पर जोर-जोर से सर हिलाकर खेलने लगे, उन्होंने अपनी दोनों कोहनीयाँ ज़मीन में मार-मार कर गड्डे कर दिये, उनके मुँह से आवाज निकलने की कोशिश में लगातार ‘लार’ बहे जा रही थी और उनकी ‘आँखें’ फटने को हो गई थी, ये मंज़र देख कर मामाजी इतनी तेज़ चिल्लाई की पूरा घर उठकर मामा के कमरे में आ गया मगर मामा का खेलना बंद नहीं हुआ,

जिसने भी उनको रोकना चाहा उन सबको मामा ने ‘घायल’ कर दिया, इतने में नाना ने मामा के ऊपर थोड़ा “गंगाजल” छिड़क दिया जिससे उनका “रोष” थोड़ा धीमे हुआ फिर सबने उनको पकड़ कर “गंगाजल” पिला दिया जिससे वो अपने ‘होश’ गंवाकर वहीं ज़मीन पर गिर गए और फिर उनको उठाकर ‘खाट’ पर लेटाया गया!

सुबह के 5:30 बजे चुके थे नाना ने नानी से कुंदन मामा के गुरु को बुलाने को कहा, कुछ देर बाद ही मामा के “गुरूजी” ने आकर सबकुछ देखने और सारी बातें सुनने के बाद “पीर साहब” वाली बात बता दी, कहा कि कैसे कुंदन की बेवकूफी की वजह से आज कुंदन की ‘जान’ भी जा सकती है, “पीर साहब” जैसी ‘शक्ति’ को कोई ‘बंधी’ नहीं बना सकता और इसने सब जानते हुए भी ये ‘दुसाहस’ और ‘मूर्खता’ की है, मैं कोशिश करके देख लेता हूँ मगर ये अब उन “पीर साहब” की ‘मर्ज़ी’ पर है कि वो कुंदन की जान ‘बक्शेगें’ या नहीं!

कुंदन मामा अपने कमरे में अपनी खाट पर ऐसे पड़े थे मानो कोई ‘कॉमा’ में चला गया हो, चढ़ी हुई आँखें तो थोड़ी खुली थी मगर बाकि शरीर अकड़ा हुआ था, गुरूजी के कहने से “पीर साहब” के लिए एक ‘हरी फूलों की चादर’, कई अगरबत्ती के पैकेट्स, बताशे, गुल दाने, कुछ इत्र की शिशियाँ और भी कई सारा समान लेकर कुंदन मामा पर से उतारा गया, “गुरूजी” ने कुंदन में अपने ‘मन्त्रों’ द्वारा फिरसे “पीर साहब” को बुला लिया,

फिरसे कुंदन मामा ज़मीन पर जोर-जोर से सर हिलाकर खेलने लगे, जब कुंदन मामा खेल रहे थे तो गुरूजी सहित सब लोग “पीर साहब” के आगे हाथ जोड़कर खड़े थे, गुरूजी ने कहा हे “पीर बादशाह” इस ‘नादान’ इन्सान से बड़ी भूल हो गई है जिसके लिए हम सब ‘शर्मिंदा’ हैं, इसके छोटे बच्चें हैं, “पीर बादशाह” कृपया करके इसको ‘क्षमा’ कर दीजिये, हम सब हाथ जोड़कर माफ़ी मांग रहे हैं और हमने आपकी भेंट भी आपको चढ़ाने के लिए तैयार की हुई है

इसकी गलती हम मान रहे हैं और ये भी जब होश में आएगा तो आपकी ‘चौखट’ पर “नाक” रगड़कर माफ़ी मांगेगा, “पीर बादशाह” इसको माफ़ कर दीजिये, ऐसा गुरूजी और मामा के सभी परिवार वाले कहे जा रहे थे फिर कुछ समय बाद मामा का खेलना एकदम बंद हो गया और वो ज़मीन पर फिरसे गिर गए, कुछ देर बाद जब उनको होश आया तो गुरूजी कुंदन मामा, नानाजी और कुछ घर के लोगों को लेकर उस “पीर साहब” के स्थान पर जा पहुँचे सारी ‘भेंट’ चढ़ाने के बाद सबने फिरसे माफ़ी मांगी और कुंदन मामा ने “नाक” रगड़कर माफ़ी मांगी तब जाकर वो माफ़ी और भेंट ‘स्वीकार’ हुई और कुंदन मामा ठीक हुए! 

इन हरकतों के बाद “बावला भगत” के नाम से लोग कुंदन मामा को जानने लगे! आस-पास के गावों में कुंदन मामा को सभी लोग “बावला भगत” कहकर उनका मज़ाक बनाने लगे, लोग “बावला भगत” के किस्से सुनकर और सुनाकर बहुत हसी-ठिठोली करते थे, “बावला भगत” तो जैसे मसखरों का पसंदीदा विषय बनकर रह गया था! घरवाले भी कुंदन मामा से परेशान रहने लगे और कहने लगे थे कि हमने तो इसको ‘भगत’ बनाया था मगर यह ना जाने कहाँ से “बावला भगत” बन गया लोगों के द्वारा “बावला भगत” नाम देने से कुंदन मामा की सेहत, सोच और कारनामों पर कोई फर्क नहीं पड़ा!

जो सुधर जाएं वो हम नहीं

भूतों की बारात“बावला भगत” की दूसरी करतूत! जैसा मैं पहले ही बता चुका हूँ कि कुंदन मामा का दिमाग कितना “ख़ुराफ़ाती” था तो कुछ दिनों तक तो वो लोगों, घरवालों और “गुरूजी” की शर्म से चुप बैठे रहे, एकदम सही चलते रहे मगर जो “शान्ति” से बैठ जाए वो “खुराफ़ाती” ही क्या? और वो “बावला भगत” कैसा? कुंदन मामा के बारे में मैं बता चुका हूँ कि वो काम-काज तो कुछ करते नहीं थे तो पूरे दिन कभी यहाँ बैठ कभी वहाँ बैठ ऐसे ही दिन निकाल देते थे और गाँव की हर बात हर चीज़ पर उनकी नज़र रहती थी

तो हुआ ऐसा कि एक दिन मामा गाँव के बुजुर्गों के साथ ‘ताश’ खेल रहे थे तो किसी ताऊ ने कल रात की बात छेड दी कि यार मैं रात को अपने खेतों में पानी चलाने गया था तो वहाँ से “भूतों की बारात” निकल रही थी, ऐसा होता देख मैं तो घर आ गया, ऐसा सुनकर कुंदन मामा के “कान” खड़े हो गए और उनका मन “रोमांच” से भर गया, मामा ने ‘उत्सुकतापूर्वक’ पूछा कि वो ‘बारात’ कहाँ से जा रही थी और कहाँ से आई होगी? 

इसपर उस बूढ़े ताऊ ने जवाब दिया कि हम तो अपने पिताजी से सुनते आ रहे थे कि पास वाले जंगल में जो ‘कुआँ’ है उसके पास से वो ‘बारात’ चढ़ती है जिसमें ढ़ोल, बैंड, बाजा और “बाराती” होते हैं और बाकायदा एक सफ़ेद “घोड़ी” पर “फूलों का सेहरा” पहने एक “दूल्हा” भी होता है, उस दूल्हे को उन “भूतों का सरदार” बताया जाता है और वो सबसे ‘ताकतवर’ और ‘ख़तरनाक’ होता है, आगे ताऊ ने बताया कि पिताजी और गाँववालों से इतने सालों से ये सब सुनते ही आ रहे थे

मगर कल रात देख भी लिया, पहले तो मुझे वो ‘सामान्य’ सी ही ‘बारात’ लगी मगर जैसे ही मैं पास जाने लगा तो मुझे शक हुआ क्यूंकि जितना मैं उस “बारात” के पास जा रहा था मुझे “मुर्दा” सड़ने की “बदबू” तेजी से आती जा रही थी रही थी और पास जाने से वो “गन्दी बदबू” बढ़ रही थी दूसरा वो बारात सड़क की जगह खेतों में होकर ‘काली नहर’ के ‘शमशान’ की तरफ जा रही थी और आगे रास्ता बंद होने के बाद भी वो बिना रुके और मूड़े आगे बढ़ती जा रही थी,

फिर एकदम से मुझे मेरे पिताजी की वो ‘भूतों की बारात’ हर ‘अमावस’ की काली रात को निकलने वाली बात याद आई तो मेरे दिमाग़ में एकदम से आ गया कि आज तो वो ही “अमावस की काली रात” है, फिर मैं बिना देर किए वहाँ से जोर से ‘बजरंगबली’ का नाम जपते हुए भाग आया और घर आकर ही सांस ली, ऐसा हर महीने “अमावस की ‘काली रात’ में होता है! आधी रात के बाद ही ये ‘बारात’ निकलती है ऐसा अब मुझे यकीन हो गया है!

भूतों की बारात में बिन बुलाया बाराती

भूतों का सरदार“बावला भगत” की आखिरी करतूत! बस फिर क्या था कुंदन मामा ने सोचा कि वो ‘दूल्हा’ जो ‘भूतों का सरदार’ है इतनी बड़ी और ‘ताकतवर शक्ति’ अगर मेरे पास आ जाये तो मैं सबकुछ कर सकता हूँ इसलिए कुंदन मामा के “खुराफाती दिमाग” ने “ठान” लिया की अब तो इस “बारात” में जाना है और “भूतों के सरदार” यानि कि “दूल्हे राजा” को उठाकर ही लाना है वरना मेरा नाम ‘कुंदन भगत’ नहीं!

एक महीना मामा ने बिना किसी को ‘भनक’ पड़े “भूतों की बारात” से उनके “दूल्हे राजा” को उड़ाने की तैयारियों में गुज़ार दिया और कुछ और ‘कठोर सिद्धियाँ’ करके तीन और देवों को प्रसन्न कर लिया, अब मामा के पास नये 3 ‘देव’ थे और पुराने 2 ‘देव’ थे तो कुल मिलाकर अब कुंदन मामा के पास 5 ‘देव’ थे जिनसे उनको ‘अमावस की रात’ में काम लेना था!

अमावस की रात में मामा उसी ताऊ के खेत के पास जहाँ उन्होंने बताया था वहाँ काफी सारा ‘टोटके’, ‘बली’ और ‘साधना’ का सामान लेकर छुपकर बैठ गए, वहाँ उन्होंने अपने 5 ‘देवों’ 

mantraको प्रसन्न करने के लिए कुछ ‘मंत्र’ पढ़े, उन ‘देवों’ की ‘साधना’ की सभी ‘सामग्री’ रखकर, उनका ‘चढ़ावा’ देकर सबका नाम लेकर एक ‘मुर्गे’ की ‘बली’ दे डाली और साथ में ‘शराब’ चढ़ाकर सभी 5 ‘देवों’ को ‘प्रसन्न’ करने की सारी प्रक्रिया पूरी कर दी!

आधी रात होते ही वो भूतों की ‘बारात’ दूर से मामा को दिखने लगी मामा भी तैयार थे और उन्होंने अपने ‘देवों’ को ‘चौकन्ना’ कर दिया और कहा कि जैसे ही मैं ‘इशारा’ करूँ तुम उस ‘दूल्हे’ को बांधकर उठा लेना और मेरे पीछे घर ले आना! इतने में ‘भूतों की बारात’ नाचते-कूदते पास में आ गई, मामा ने तुरन्त ही अपने 5 ‘देवों’ को आदेश दिया कि “दूल्हे को उठा लो” और मामा वहाँ से तेज़ी से भागते हुए घर आ गए!

5 ‘देवों’ की ‘शक्ति असीम’ थी इसलिय उन्होंने बिना देर किए ऐसा ही किया, जब मामा घर आए तो सब सोये हुए थे, पीछे-पीछे “पांचो देव” उस ‘भूतों के सरदार’ को उठा लाये थे और उन पांच देवों ने मामा से पूछा कि “गुरु” अब इसका क्या करना है? तो मामा ने कहा कि इस दूल्हे को अपने पास सुबह तक पकड़कर ‘कैद’ में रखो बाकि क्या करना है वो सुबह बताता हूँ!

मामा ने सोचा कि मैं भी थोड़ा सो लेता हूँ और ये “भूतों का सरदार” यानि “भूतों की बारात का दूल्हा” तो अब मेरी पकड़ में आ ही चुका है, ये दूल्हा बहुत ही “शक्तिशाली” होगा इसलिय इसको सुबह देखता हूँ कि इससे क्या-क्या काम लेने हैं?

घर आई भूतों की बारात / Ghar Aayi Bhooto ki Baarat

Ghar Aayi Bhooto ki Baarat“बावला भगत” उर्फ़ कुंदन मामा उस रात तो सो गए मगर सुबह जब मामी उठी तो पूरे घर में ‘चीख’ और ‘पुकार’ मच गई, पूरा मोहल्ला मामा के घर के बाहर इकठ्ठा हो गया था,

कुंदन मामा के मुँह, नाक और कान से खून बहे जा रहा था और मामा बिलकुल होश में नहीं थे, उनको तुरन्त शहर वाले बड़े हॉस्पिटल में ले जाया गया जहाँ उनको पहले ‘आई.सी.यू’. में फिर रात होते-होते ‘वेंटीलेटर’ पर रखा गया, दो दिनों बाद उनकी ‘मौत’ हो गई, ‘डॉक्टर’ कोई “पुख्ता” कारण नहीं बता पाए, मामा के ‘अंतिम संस्कार’ वाले दिन रात को नानाजी को “हार्ट अटैक” पड़ गया फिर सब उनको लेकर ‘हॉस्पिटल’ भागे, अभी हॉस्पिटल आए ही थे कि कुंदन मामा का बेटा सीढ़ियों से गिर गया और उसका भी ‘सर’ फट गया!

यह सबकुछ इतना जल्दी और एक के बाद एक हो रहा था कि संभलने या सोचने का कोई मौका ही नहीं मिल रहा था! नानाजी की तबियत 3 दिनों बाद जाकर ठीक हुई और वो घर आ गए उसी दिन मामी की रसोई में काम करते समय साड़ी में आग लग गई और वो जलते-जलते बच गईं!

नानाजी को समझ नहीं आ रहा था के एक ही हफ्ते में इतने सारे हादसे कैसे हो सकते हैं तो उन्होंने फिरसे मामा के ‘गुरूजी” को बुलाया, अगले दिन गुरूजी आए और पूरे घर का ‘मुआयना’ करके उन्होंने पहले ‘ध्यान’ लगाया फिर उस घर के “कुलदेवता” और मामा के 2 “देव” (जो गुरूजी ने मामा को देकर उनको भगत बनाया था) उनसे सम्पर्क किया तो वहाँ से उनको जो जानकारी मिली जिससे “गुरूजी” के होशो-हवास उड़ गए

‘गुरूजी’ अपना ध्यान तोड़कर नानाजी के पास जाकर बैठ गए और कहने लगे कि ‘बाउजी’ आप सब लोगों को ये घर अभी खाली करना पड़ेगा, इस घर में अभी एक मौत हुई है मगर अभी और कई मौतें होने के ‘आसार’ बन गए हैं!

नानाजी ने गुरूजी से कहा के गुरूजी जो कहना है खुलकर बताओ हम पहले ही डरे हुए हैं और हमें मत डराओ, बात क्या है? वो साफ शब्दों में बता दो, नानाजी, नानीजी, मामी और बाकि ‘घरवाले’ सभी बैठे थे उन सभी के सामने ‘गुरूजी’ ने बोलना शुरू किया कि मुझे ‘देवों’ से सम्पर्क करके अभी पता चला है कि कुंदन जिस दिन ‘हॉस्पिटल’ गया उसे पहले वाली रात यानि अमावस की रात में कुंदन ने जो ‘भूतों की बारात’ आपके इस गाँव से होकर जाती है

उसके पास जाकर अपने ‘देवों की शक्ति’ से देवों का ‘भोग और चढ़ावा देकर और उनको प्रसन्न करके उस ‘भूतों की बारात’ का ‘दूल्हा’ यानि कि उनका ‘सरदार’ उन ‘देवों’ से उठवा लिया और घर ले आया! कुंदन नहीं जनता था आगे क्या होगा इसलिय वो सो गया और उन ‘भूतों का सरदार’ ‘देवों’ की ‘गिरफ्त’ में ही रह गया, कुंदन के सोते ही ‘भूतों की बारात’ ने आपके इस घर पर हमला कर दिया और कुंदन को उसी समय लगभग मार ही डाला, कुंदन के मरने के बाद भी इस घर में कितने ‘हादसे’ हुए ये उन्होंने ही करवाये हैं,

अब दिक्कत ये है कि उनका ‘सरदार’ ‘देवों’ के कब्जे में है और उस सरदार को छुड़ाने के लिए उस ‘भूतों की बारात’ ने इस घर में ‘डेरा’ डाल लिया है जब तक उनका सरदार उन ‘देवों’ की पकड़ से नहीं छूट जाता तब तक वो इस घर से नहीं जायेंगे और उनकी ये “चेतावनी” है कि अगर उनका “सरदार” अगले दो दिनों में नहीं छोड़ा गया तो वो इस घर को “शमशान” बना देंगे!

महागुरु ने रचा महाखेल

सभी लोग बहुत ज्यादा डर गए, नानाजी ने ‘गुरूजी’ से कहा हम अभी ये घर खाली कर रहे हैं तुम आज से ही अपना इलाज शुरू कर दो इसपर ‘गुरूजी’ ने कहा कि बाउजी ये अब मेरी ‘क्षमता’ से बाहर ही बात हो गई है, मैं ये इलाज नहीं कर पाउँगा इससे मेरी और मेरे परिवार की ‘जान’ को ‘खतरा’ है, यह सुनकर नानाजी निराश हो गए और गुरूजी के आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गए और बोले कि मैं बीमार बूढा व्यक्ति इतनी जल्दी इतना ‘काबिल’ इन्सान कहाँ से लाउँगा? अगर तुमने साथ नहीं दिया तो मेरा तो बचा हुआ परिवार भी ‘ख़त्म’ हो जायेगा और ऐसा कहकर नानाजी रोने लगे!

two men doing poojaजिससे ‘गुरूजी’ को दया आ गई और उन्होंने अपने ‘गुरू’ से इस बारे में बात करके कहा की हमारी ‘किस्मत’ बहुत अच्छी है कि मेरे ‘महागुरू’ ने हाँ कर दी है वो बहुत ही ‘ज्ञानी’ व्यक्ति हैं और उन्होंने ‘इंद्रजाल’ (तंत्र, मंत्र और साधना की पुस्तक)भी पढ़ा हुआ है उन्होंने इस घर का इलाज करने के लिए हाँ भर दी है तो मुझे पूरा विश्वास है कि वो ‘भूतों की बारात’ यहाँ से जल्द ही रवाना हो जाएगी, बस आप लोग जल्दी से इस घर को अभी खाली कर दीजिये! नानाजी जल्दी ही सबको लेकर वहाँ से निकल गए और पास में उसी गाँव में अपने भाई के घर चले गए!

‘गुरूजी’ नानाजी से पैसे लेकर अपने ‘महागुरु’ का बताया हुआ सभी सामान और एक ‘जीवित बकरा’ लेकर उस घर में पहुँच गए, गुरूजी के साथ महागुरु और नानाजी भी वहाँ आ चुके थे शाम के 8 बजे का समय हो चुका था, महागुरु ने सभी सामान और सामग्री रख कर ‘साधना’ शुरू कर दी, ‘गुरूजी’ नानाजी और ‘महागुरु’ उस घर में बस तीन ही लोग मौजूद थे कुछ देर बाद पहले तो ‘महागुरु’ ने उन 5 देवों को बुलाकर उनको ‘चढ़ावा’ देने के बाद उस ‘भूतों के सरदार’ को उनसे छुड़ाया गया फिर उस ‘भूतों की बारात’ को अपने ‘मन्त्रों’ की ‘शक्ति’ से उस घर के आँगन में ही इकठ्ठा कर दिया!

पूरे घर में मुर्दा सड़ने की बदबू फैल गई थी और तीनों लोग जो वहाँ बैठे थे सबके कानों में उस ‘भूतों की बारात’ की गुस्से से चीखने की आवाजें आ रही थी, फिर ‘महागुरु’ उस ‘भूतों के सरदार’ से बात करने लगे और बोले अब तुझे मैं आज़ाद कर रहा हूँ, तुझे कुंदन ने कैद कर लिया था बदले में तेरे बरातियों ने उसको बेरहम से मार दिया और तुम सबका बदला अब पूरा हो गया है,

अब इस घर और इसमें रहने वाले परिवार को छोड़कर चले जाओ मैं तुम्हें तुम्हारी ‘बारात’ के साथ भेज रहा हूँ बस जाने से पहले मुझे एक ‘वचन’ देना होगा के तुम लौट कर ना तो इस घर में और ना ही इस परिवार के किसी सदस्य के जीवन में वापस आओगे!

वो तीनों नमक और हल्दी से बने सुरक्षा घेरे में बैठे थे ‘भूतों की बारात’ उन तीनों पर ‘हमला’ करने की बहुत कोशिश कर रही थी मगर उस सुरक्षा घेरे की वजह से वो सब उन तीनों पर वार करने में असमर्थ थे! ‘भूतों के सरदार’ को मनाने में उस रात 9 बजे से रात का 1 बज गया तब जाकर वो माना मगर उसने कहा मेरी एक मांग है

अगर वो पूरी नहीं होगी तो हम यहाँ से कभी भी नहीं जायेंगे, ‘भूतों के सरदार’ की वो मांग सुनकर ‘गुरूजी’ और नानाजी क्या ‘महागुरु’ तक हिल गए, उस ‘भूतों के सरदार’ की मांग थी कि मुझे और मेरे साथियों को एक “नर बली” चाहिए और वो भी इसी घर के सदस्य की तब जाकर हम यहाँ से हमेशा के लिए जायेंगे!

गुरूजी और नानाजी तो “सदमे” में चले गए कि ये मांग तो पूरी हो नहीं सकती फिर आगे क्या होगा मगर “महागुरु” ने काफी पहले ही इसका ‘उपाय’ सोच रखा था, “महागुरु” ने कहा के ये मांग नहीं मानी जाएगी और मैं अभी एक ऐसी “साधना” करूँगा के “सरदार” सहित ‘भूतों’ की सारी ‘बारात’ यहीं “भस्म” कर दूँगा, मगर मैं मानता हूँ कि तुम्हारी गलती नहीं थी इसलिय मैं तुम्हें ‘नरबली’ की जगह इस “बकरे की बली” देकर तुम्हारी “मांग” पूरी कर दूँगा, बताओ अगर तुम “राज़ी” हो तो वरना अभी “साधना” करके तुम सबको “भस्म” करता हूँ,

“महागुरु की महामहिमा” के आगे वो “भूतों का सरदार” और उसकी “बारात” सब “झुक” गए और फिर जल्दी से “महागुरु” ने “बकरे की बली” देकर सभी “सामग्री” से उस घर का “उतारा” किया और “बकरे” का शरीर “एक बोतल शराब” और उतारे वाली “सामग्री” को “गुरूजी” ने उठाया और अपनी ‘जान’ ‘जोखिम’ में डालकर उसी “काली नहर” वाले ‘शमशान’ पर इन सभी वस्तुओं को छोड़ा दिया जहाँ तक उनकी “बारात” जाती थी और “अंत” में उस “भूतों की बारात” ने हमारे “नानाजी” का घर छोड़ दिया!

हमने देखा कि एक “बावला भगत” की वजह से उसके पूरे परिवार की ‘जान’ ‘आफत’ में आ गई इसलिए ऐसी ‘शक्तियों’ से बिना वजह छेडछाड़ करना सही नहीं होता, फिर भी अगर कोई छेड़छाड़ करे तो उसके लिए कहना ही पड़ेगा “आ ‘भूत’ मुझे मार”.

शक्तियों का दुरूपयोग:
शक्तिओं से ना छेड-छाड़ करो शक्तिओं से ना खिलवाड़ करो,
ये शक्तियाँ तुम्हारा हाथ ही नहीं जीवन भी जला सकती हैं,
इन शक्तिओं का सही उपयोग करो और इनको नमस्कार करो!

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घर आई भूतों की बारात। सबसे डरावनी भूत की कहानी

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