1 जिगरी भूत की कहानी | मजेदार भूत की कहानी

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कई महीने बाद मैं रात में पास के एक “सिनेमा” में फ़िल्म देखने चला गया सोचा शायद मन थोड़ा हल्का हो जाए, रात का “शो” था और इसलिय लोग काफी कम थे, मेरे आस-पास की सभी सीटें खाली थी फ़िल्म शुरू हुए 1 घंटा गुजर चुका था कि अचानक मेरे हाथ पर किसी ने हाथ रख दिया मैंने हैरानी से देखा तो मैं हक्का-बक्का रह गया, वो “अजित” था, फ़िल्म की लाइट से उसका चेहरा मैं साफ देख पा रहा था, वो बराबर वाली सीट पर ही बैठा था और हंस रहा था,

मैंने पूछा, यार तू वापस कैसे आ गया तो वो हंसकर बोला तू मुझे दिन-रात इतना याद करता है और एक दोस्त इतना याद करे तो दूसरा दोस्त कहीं भी हो उसको आना ही पड़ता है इतना कहकर वो फिर जोर से हँसने लगा और तभी “फ़िल्म” का “इंटरवल” हो गया और सारी लाइटें जल गई और उसका चेहरा उस रौशनी में कहीं खो गया!

फिर क्या हुआ “जिगरी भूत की कहानी” पूरी पढ़कर जाने…

जिगरी भूत की कहानी की भूमिका

आपने और हमने ये कई बार पढ़ा होगा कि भगवान जिन लोगों को खून के रिश्तों में बांधना भूल जाता है उनको वो दोस्त बनाकर हमारे जीवन में भेज देता है, ऐसा दोस्त जिससे हम सुख बांटकर सुख को बढ़ा लेते हैं और दुख बांटकर उसको कम कर लेते हैं! ऐसा दोस्त जो हमारी उपलब्धि को अपनी समझता है,

हर बुरे वक़्त में हमारे साथ नहीं हमसे आगे खड़ा होता है और ऐसा दोस्त अगर आपका है तो आप भी इस बात से सहमत होंगे कि इस दुनिया से ऐसे दोस्त के जाने के बाद हम अपने आगे के जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते! अगर आपका कोई ऐसा दोस्त है तो आप बहुत किस्मत वाले हैं जैसे की मैं हूँ!

मेरा नाम सुनील है, मैं अलवर राजस्थान से हूँ, ये घटना कुछ 16 साल पुरानी, 2007 की है! मेरी ही गली में एक ‘अजीत’ नाम का लड़का रहता था वो और मैं बचपन के दोस्त थे हमारी दोस्ती उतनी ही पुरानी थी जितनी हमारी उम्र, यानि हमारी दोस्ती 30 साल पुरानी थी, “अजित” और मैं एक-दूसरे के साथ पढ़कर, खेलकर, सुख-दुख में एक-दूसरे के लिए खड़े होकर ही बड़े हुए थे,

दोनों के परिवार में झगड़े चाहे होते रहे मगर हम दोनों में कभी कोई झगड़ा नहीं हुआ, जहाँ जाते थे साथ जाते थे, कभी वो मेरे घर कभी मैं उसके, हम दोनों के दूर के रिश्तेदार भी हमारी दोस्ती के बारे में जानते थे और आये दिन हमारी मिसालें भी खूब दी जाती थी, एक को कोई छोटी या बड़ी दिक्कत हो जाए तो दूसरा उसका साया बनकर जबतक उसके साथ रहता था जबतक वो दिक्कत ख़त्म ना हो जाए!

हर महीने फ़िल्म साथ देखना, आए दिन एक-दूसरे के साथ घूमने जाना, हमने कभी पैसा, लड़की, घरवालों या किसी को भी अपनी दोस्ती के बीच में नहीं आने दिया! सोने से पहले हम एक साथ होते थे और जागते ही एक-दूसरे के घर में आ जाते थे, शाम को अपनी नौकरियों पर से आने के बाद फिर एक-दूसरे के साथ हो लेते थे, बस ऐसा समझ लीजिये कि जिस दिन हम एक-दूसरे से ना मिलें तो उस दिन को हम “मनहूस” ही मानते थे भले ही हमारा उसमें कितना फायदा ही क्यों ना हुआ हो!

दुर्भाग्य से भी बढ़कर

jigri bhootएक दिन हम दोनों बाइक से ऋषिकेश जा रहे थे सोचा कि “श्री गंगाजी” में डुबकी लगा आते हैं, हम दोनों की दो दिनों की काम से छुट्टी थी इसलिय हम सुबह 5 बजे ही निकल गए, गर्मी का मौसम था तो कोई दिक्कत भी नहीं थी मगर आगे जाकर जब हम “हरिद्वार” पार करके “ऋषिकेश” पहुँचने वाले थे तब एक मोड़ पर बाइक मोड़ते समय एक कार सामने आ गई हम जब अचानक ब्रेक मारे तो वहाँ लाल रेत पड़ा था जिसपर बाइक रगड़ खाकर फिसल गई और पास के बड़े गड्डे में जाकर गिर गई, उस गड्डे में काफी पत्थर थे, घर से रुड़की तक मैंने बाइक चलाई और अब “अजित” बाइक चला रहा था, 

मुझे बस इतना याद है हम दोनों बाइक सहित उस बड़े गड्डे में जाकर गिरे और फिर मैं बेहोश हो गया, जब होश आया तो मैं एक अस्पताल में था, मेरी एक टांग की हड्डी टूट गई थी और शरीर पर काफी गंभीर चोटें भी आई थी जिससे “असहनिय दर्द” हो रहा था मगर मेरी जान तब निकल गई जब यह पता चला कि मेरा दोस्त, मेरी ज़िन्दगी मेरा सबकुछ “अजित” उस “दुर्घटना” से बच नहीं पाया और उसकी मौत वहीं उसी गड्डे में हो गई थी इस बात का मुझे मेरे होश आने के 3 दिनों बाद पता चला! 

accidentमेरी तो आँखों के आगे “अंधेरा” छा गया ऐसा लगा कि मेरी दुनिया उजड़ गई क्यूंकि बचपन से दोस्त के साथ रहे उसके साथ रहने की हर काम करने की आदत थी, दोस्त के बिना जीवन जीने की कल्पना भी दिल दहला देती थी और आज की ये विडंबना देखो ये सच था कि अब जीवन दोस्त के बिना ही जीना था,

मैं ये सोचता रहता था मैं भी क्यों नहीं उसके साथ चला गया? यहाँ ना सही उस लोक में ही सही दो दोस्त साथ तो होते! घरवाले, पत्नी, बच्चें और बाकी सब लोग थे मगर वो जो सबसे जरुरी था वो ही हमेशा के लिए इतनी दूर चला गया था, मैं तो उसी दिन जिंदगी का अंत मानकर डिप्रेशन में चला गया था, मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी, किसी से बात तक नहीं करता था क्यूंकि कहीं भी मन नहीं लगता था!

मैं रोज यही सोचता कि शायद जहाँ वो गया है वहाँ से लोग वापस आ सकते तो मेरा दोस्त भी वापस आ जाता, रात-दिन मन ऐसा करता था कि बस वो वापस आ जाए!

दिल से पुकारा, लौटा यार दोबारा

dost ki aatma
कई महीनों बाद मैं रात में पास के एक “सिनेमा” हॉल में फ़िल्म देखने चला गया सोचा शायद मन थोड़ा हल्का हो जाए, रात का “शो” था और इसलिय लोग काफी कम थे, मेरे आस-पास की सभी सीटें खाली थी फ़िल्म शुरू हुए 1 घंटा गुजर चुका था की अचानक मेरे हाथ पर किसी ने हाथ रख दिया मैंने हैरानी से देखा तो मैं हक्का-बक्का रह गया

वो “अजित” था, फ़िल्म की लाइट से उसका चेहरा मैं साफ देख पा रहा था, वो बराबर वाली सीट पर ही बैठा था और हंस रहा था, मैंने पूछा, यार तू वापस कैसे आ गया? तो वो हंसकर बोला तू मुझे दिन-रात इतना याद करता है और एक दोस्त इतना याद करे तो दूसरा दोस्त कहीं भी हो उसको आना ही पड़ता है

इतना कहकर वो फिर जोर से हँसने लगा और तभी “फ़िल्म” का “इंटरवल” हो गया और सारी ‘लाइटें’ जली गई जिससे उसका चेहरा उस रौशनी में कहीं खो गया, मैंने जल्दी से उठकर आस-पास देखा फिर बाहर निकल कर “कैंटीन” में सबके चेहरों में उसको ‘तलाशा’ मगर कोई फायदा नहीं हुआ वो कहीं नहीं था!

मैं आधी “फ़िल्म” छोड़कर “घर” वापस आने के लिए निकल गया और पूरे रास्ते खुद से यही पूछता रहा कि ‘मरकर’ भी कोई वापस आ सकता है क्या? घर जाकर मैंने सबको ये बात बताई मगर सबने कहा तुझे “वहम” हुआ होगा! थोड़ी देर बाद मैं अपने कमरे में सोने के लिए चला गया जहाँ मेरी बीवी और बच्चा सो रहे थे, जैसे ही कमरे की लाइट बंद करके “बिस्तर” पर लेटा वैसे ही मुझे “अजित” की मौजूदगी का अहसास हो गया था, इस बार मैं डरा नहीं और “अजित” से मैंने कहा कि “अजित” मुझे पता है तू यहीं है,

इतना कहना था कि वो मेरे पास आकर लेट गया, ‘डबल बेड’ की एक तरफ बीवी और बच्चा और दूसरी तरफ “अजित” आकर लेट गया, फिर हमने खूब सारी बातें की और काफी समय बाद मैं इतना खुलकर हंस रहा था, मेरी आवाज़ से मेरी बीवी ‘जाग’ गई और उसने मेरी आवाजें सुनी और हैरान रह गई कि कमरे में मैं किस से बात कर रहा हूँ?

मित्र को मंत्रों से भगाया

mantra
अगले दिन मेरी बीवी ने ये बातें ‘मम्मी-पापा’ को बता दी और उन्होंने अब मुझपर नज़र रखनी शुरू कर दी! एक रात पापा ने मुझे “अजित” के घर के पास खड़ा हुआ और पेड़ के तने की तरफ मुँह करके बातें करते और हंसते हुए देख लिया फिर अगले ही दिन उन्होंने एक बड़े “पंडितजी” को घर बुलाकर ‘हवन’ कराया फिर पूरे घर को “श्री गंगाजल” से ‘शुद्ध’ करके सबके गले में “मन्त्र” पढ़े “काले धागे” “पंडितजी” ने पहना दिया और मैं भी इस बात को नहीं समझा कि ऐसा उन्होंने “अजित” को मुझसे और हमारे घर से दूर रखने के लिए किया था!

 मैं “अजित” को जितना भी याद करता वो नहीं आता था इसलिए मैं फिर से परेशानी रहने लगा सोचता था कि दूसरी दुनिया से ही सही “अजित” मिलने तो आता था, हम बात कर लेते थे, मेरा मन हल्का हो जाता था और अब जीवन में फिरसे खालीपन आ गया है!

गुंडों ने पहुंचाया मौत की देहलीज़ पर

मैं और अजित जहाँ भी जाते थे, जहाँ हमारी ‘यादें’ बसी हुई थी! मैं हर जगह जाने लगा, कभी ‘मंदिर’ में जाता, कभी पास की ‘नहर’ मैं जाकर हम दोनों की पुरानी यादें ताज़ा करता, हम पास ही नहीं दूर भी जाया करते थे इसलिए कभी मन करता तो दूर किसी गाँव में आम तोड़ने चले जाते और घंटों वहाँ “आम” तोड़कर खाते और कभी “टूबवेल” पर ‘नहा’ लिया करते थे! एक दिन मेरा उसी खेत में जाने का मन हुआ, वो खेत घर से काफी दूर था इसलिए मैं बाइक लेकर बिना किसी से कुछ कहे निकल गया,

समय दोपहर के लगभग एक बजे होंगे, उस खेत में जाने के लिए एक ‘वीरान’ सा ‘जंगल’ पार करना पड़ता था तो मैं उसी ‘जंगल’ से होकर गुजर रहा था तब मैंने देखा कि 4-5 तड़गे से लड़के जंगल से अचानक निकलकर मेरी बाइक के सामने आ गए जिनके पास “चाकू” और “उसतरे” थे, 

सबने मुँह को पूरा कपडे से ढका हुआ था, मैंने अपनी बाइक इधर-उधर करके वहाँ से निकलने की बहुत कोशिश की मगर इसी कोशिश में मेरी बाइक फिसल गई और मुझे और मेरी बाइक को वो गुंडे सड़क से ले जाकर ‘घने जंगल’ के अंदर ले गए! मुझे मारने और लूटने लगे,

मैंने भी उनसे थोड़ा मुकाबला किया, लड़ाई में मेरे सारे कपडे फट गए, गुंडों ने मेरे सारे पैसे छीन लिए, मेरा मोबाइल भी ले लिया और मेरी गले से मेरे “सोने की चेन” भी तोड़ ली और उन्होंने ये सब लेने के लिए अपने ‘चाकूओं’ और ‘उस्तरे’ से मेरे ‘पेट’ पर कई ‘वार’ किए जिससे मेरा ‘पेट’ फट गया और खून की ‘धारा’ पेट से निकलने लगी उसके बाद वो मुझे एक गड्डे में धक्का देकर भाग गए फिर मुझे होश नहीं क्या हुआ!

मरके भी निभाया दोस्ताना

Friendshipमेरी 2 दिनों बाद आँखें अस्पताल में खुली तो देखा कि मेरे घरवाले मेरे सामने खड़े हैं और मेरे पेट में काफी खिंचाव हो रहा है, मैंने उठकर देखना चाहा तो पापा ने कहा उठ मत तेरा “ऑपरेशन” हुआ है, पूरे “पेट” में “टाँके” लगे हुए हैं! फिर मुझे 2 दिन पुरानी वो गुंडों से लड़ाई वाली बात याद आई, उस बात को याद करने के बाद मुझे सँभलने में थोड़ा वक़्त लगा! अचानक मेरे मन में ये सवाल आया कि मैं तो सुनसान घने “जंगल” में घायल और बेहोश था तो मुझे अस्पताल किसने पहुँचाया? और मेरे अस्पताल में होने की आप लोगों को किसने खबर दी?

पूरी घटना घरवालों को बताकर ये सभी सवाल मैंने अपने पापा से कर डाले! पापा थोड़ा भावुक हो गए उनका गला भर आया और वो बोले बेटा हम शर्मिंदा हैं कि हम “अजित” और तेरी दोस्ती को समझ नहीं पाए!

अजित के मरने के बाद भी वो तुझे फिर दिख रहा था इसलिए हमने उसको तुझसे दूर करने के लिए तेरे गले में मंत्र पढ़ा हुआ “काला धागा” बांध दिया! आगे पापा ने कहा तुझे जब गुंडे लूट रहे थे और तुझे मार रहे थे तो उन्होंने तेरी “सोने की चेन” जब तेरे गले से तोड़ी होगी तो तेरा वो “मन्त्र” पढ़ा “काला धागा” भी टूट गया जिससे “अजित” को तेरे पास आने और तुझे बचाने का मौका मिल गया, 

अस्पताल से हमें पता चला कि तुझे जो लड़का यहाँ लाया था वो “अजित” ही था और जिस लड़के ने हमें फ़ोन करके तेरे यहाँ होने की जानकारी दी उसने अपना नाम नहीं बताया मगर उसकी आवाज़ “अजित” जैसी थी, फिर हमने अस्पताल से “अजित” का फोटो दिखाकर पूछा कि क्या ये लड़का “सुनील” को लेकर आया था तो उन्होंने कहा हाँ यही लड़का लाया था, 

yaranaपापा ने आगे कहा कि “अजित” ने तेरे घायल शरीर को तेरी ही बाइक पर रखकर तुझे अस्पताल पहुँचाया और तेरी जान बचाई, साथ में तेरा मोबाइल, “सोने की चेन” और “पैसे” सब हमें तेरे अस्पताल वाले बेड के पास ही रखे मिले! बाकि उन गुंडों का तो पता नहीं मगर मुझे लगता है “अजित” ने उनको भी काफी मार लगाकर ही छोड़ा होगा! हमारा पूरा परिवार इस बात पर हँसने लगा!

मैंने तो आज तक यही सुना था और आप लोगों ने भी जरूर सुना होगा कि “मरा हुआ मरे हुओ में ही खिंचता है और ज़िंदा ज़िंदों में खिंचता है” मेरे केस में तो ये बात सच नहीं निकली, मुझे तो मरते-मरते मेरा “जिगरी दोस्त अजित” एक नया जीवन दे गया था जैसे मानो कह रहा हो कि “दोस्त अपने हिस्से का अगर तू जीवन जी चुका हो तो अब मेरे हिस्से का जीवन जी ले”

अब पता नहीं ऐसा और इतना सब करके मेरे “जिगरी दोस्त अजित” ने अपनी दुनिया का कोई बड़ा नियम या कानून तोड़ा था या अजित ने हमारी दोस्ती हर नियम और कानून से ऊपर रखी थी, जो भी था मगर ये सब एक “एहसास” बनकर अब हमेशा मेरे साथ रहेगा!

अगर आपको भी ये घटना ‘जिगरी भूत’ पढ़कर अपने ‘जिगर दोस्त’ की याद आयी हो तो अपने ‘जिगरी दोस्त’ को ये कहानी, मेरी ये सच्ची घटना ‘जिगरी भूत’ की कहानी जरूर भेज देना

दोस्ती:
लफ्जों में जो ना बयां हो वो दोस्ती,
सबसे गहरे जिसके निशां हो वो दोस्ती!
वो ज़िन्दगी भी हो, वो बंदगी भी हो,
धड़कते दिल की धड़कन भी हो,
और हर पल जी भरकर जीने की उमंग जगाये वो दोस्ती!

 

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